दहेज़ का काट – शिक्षा
दहेज़ सामाजिक कुरीतियों में से एक है, प्रारंभ में दहेज़ कन्या पक्ष की
तरफ से वर पक्ष को उपहार स्वरुप दिया जाता था लेकिन वर्तमान में यह प्रचलन बन गया
है मांगने का, जिसमे वर पक्ष के लोग मोटी रकम व कीमती उपहार की मांग रखते है अगर
आप उनकी मांग पूरी नही करते है, तो आपको शायद सुयोग्य वर न मिले ऐसी लोगो की अवधारणा
भी बन गई है.
आज दहेज़ की जड़ें इतनी गहरी हो गई है की इसके गिरफ्त में हर जाति, वर्ग
और संप्रदाय के लोग कैद हो चुके है, दहेज़ लोभी लोग कन्या पक्ष के समक्ष अपनी मांग
रखने में जरा भी नही हिचकिचाते, दोष सिर्फ दहेज़ लेने वाले का ही नही अपितु देने
वाले का भी है जो उनकी ना खत्म होने वाली
मांगो को स्वीकार करते है, सच तो यह है की आज भी लोग लड़की की शिक्षा से ज्यादा उसके
दहेज़ पर खर्च करते है, यही अगर वो दहेज़ का पैसा शिक्षा पर लगा दें तो उन्हें अच्छा
वर ढूढने की जरूरत नहीं पडेगी और इससे दहेज़ पर अंकुश भी लगेगा.
अभी समाज में दहेज़ से जुड़ा दृशय कुछ ऐसा है मानों लड़को की बोली लगाई
जाती है , जहाँ सरकारी नौकरी वाला लड़का 20
लाख में बिकता है, वहीं डॉक्टर व इंजीनियर 50 लाख में, और तो और इस एक मात्र दहेज़
के कारण लड़कियों को मौत तक का सामना करना पड़ जाता है.
दहेज़ अभी एक दीमक की भांति, हमारे समाज को भीतर ही भीतर खोखला करता जा
रहा है. अब जरुरत है दहेज़ देने से जादा अपनी बेटियों को सशक्त व आत्मनिर्भर बनाने
की, जब हम ऐसा करेंगे तभी इसे एक अहम कदम माना जाएगा, दहेज़ जैसे दलदल से बाहर
निकलने के लिए और सरकार को भी दहेज़ के लिए सख्त कानून बनाने चाहिए तथा जो दहेज़ नही
लेते उनको उनको पुरुस्कृत भी करना चाहिए जिससे दहेज़ ना लेने की प्रवत्ति को बढ़ावा मिले |
जहाँ समाज में एक ओर 21वीं सदी के दौर में लड़के व लडकिया कंधे से
कन्धा मिलाकर चल रहे है, वहां दहेज़ जैसी कुरीति आज भी जीवित क्यों है, यह एक सोचने
वाली बात है. अगर हम सच में इससे निज़ात चाहते है तो शिक्षा को बढ़ावा देना बहुत ही
आवश्यक है.
- पूजा अवस्थी

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